Sudarshantoday ब्यूरो: बुंदेलखंड के क्रिकेट मैदानों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय शूटिंग रेंज तक का सफर तय करने वाले मेराज अहमद खान एक बार फिर एशियाई खेलों के मंच पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार हैं। 50 वर्षीय यह दिग्गज निशानेबाज अपने चौथे एशियाई खेलों में हिस्सा लेने जा रहे हैं, लेकिन उनके जहन में आज भी वही ओलंपिक पदक का सपना जिंदा है, जिसे उन्होंने दो दशक पहले देखा था।
एक लक्ष्य, एक जुनून
मेराज के लिए शूटिंग केवल एक खेल नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। रियो ओलंपिक की यादें हों, कोविड-19 का कठिन दौर या व्यक्तिगत जीवन में अपनों को खोने का गम, मेराज ने हर बाधा को एक ‘टारगेट’ की तरह देखा है। उनका मानना है कि जब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो जाता, तब तक रुकने का कोई सवाल ही नहीं है।
मैं तब तक हार नहीं मानूंगा जब तक मैं जीत नहीं जाता। मेरा पूरा ध्यान अब केवल अगले टारगेट पर है, क्योंकि यही मेरी फिलॉसफी है।
सफलता की लंबी यात्रा
भारत के पहले ओलंपिक स्कीट शूटर और विश्व कप चैंपियन बनने तक का मेराज का सफर संघर्षों से भरा रहा है। काहिरा में मिली ऐतिहासिक जीत ने न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया, बल्कि भारतीय शूटिंग जगत में एक नई उम्मीद भी जगाई है।
मुख्य बिंदु:
- मेराज अहमद खान का यह चौथा एशियाई खेल है।
- वे भारत के पहले पुरुष स्कीट वर्ल्ड कप चैंपियन हैं।
- 50 साल की उम्र में भी उनका फिटनेस और फोकस युवाओं के लिए प्रेरणा है।
- ओलंपिक पदक का सपना पिछले 20 वर्षों से उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बना हुआ है।
आगामी एशियाई खेलों में मेराज न केवल अपनी तकनीक का प्रदर्शन करेंगे, बल्कि वे उन लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल पेश करेंगे जो उम्र को सफलता की बाधा मानते हैं। उनके लिए हर शॉट एक नई शुरुआत है और हर प्रतियोगिता खुद को साबित करने का एक और मौका।

















Leave a Reply