दिव्यांगजन अधिकार नीति: एक दशक बाद भी बदलाव का इंतजार, फाइलों में उलझा भविष्य

दिव्यांगजन अधिकार नीति: एक दशक बाद भी बदलाव का इंतजार, फाइलों में उलझा भविष्य

Sudarshantoday ब्यूरो: भारत में दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण और उनके समावेशी विकास के लिए बनी राष्ट्रीय नीति को एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इसके पुनर्गठन की प्रक्रिया आज भी फाइलों में दम तोड़ रही है। वर्ष 2016 में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के आने के बाद उम्मीद जगी थी कि नीतिगत ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन होगा, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी निराशाजनक बनी हुई है।

नीतिगत सुस्ती और चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान नीति आधुनिक समय की जरूरतों और तकनीक के साथ तालमेल बिठाने में विफल रही है। शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में दिव्यांगों की सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जिस तेजी की आवश्यकता थी, वह नदारद है। सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी और बजट आवंटन में स्पष्टता का अभाव इस देरी के मुख्य कारण माने जा रहे हैं।

दिव्यांगजन अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उसे लागू करने वाली नीति को समय के अनुसार अपडेट नहीं किया जाता, तब तक समानता का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

प्रमुख बिंदु जो नीति में सुधार की मांग करते हैं

  • डिजिटल इंडिया के दौर में दिव्यांगों के लिए सुलभ तकनीक का अभाव।
  • निजी क्षेत्र में दिव्यांगों के लिए रोजगार के अवसरों का सीमित होना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं और पुनर्वास केंद्रों की भारी कमी।
  • सरकारी भवनों और परिवहन प्रणालियों में ‘एक्सेसिबिलिटी’ का अधूरा क्रियान्वयन।

सामाजिक न्याय मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, नई नीति के मसौदे पर विचार-विमर्श जारी है, लेकिन अंतिम मंजूरी में हो रही देरी ने दिव्यांग समुदाय में असंतोष पैदा कर दिया है। अब देखना यह है कि सरकार इस महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार को कब तक धरातल पर उतार पाती है।

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