Sudarshantoday ब्यूरो: ग्रैमी पुरस्कार विजेता संगीतकार रिकी केज ने हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पुनर्गठित पैनल में अपनी नियुक्ति को एक बड़ी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है। केज का मानना है कि सेंसरशिप का मतलब रचनात्मकता को दबाना नहीं, बल्कि दर्शकों को सही जानकारी देना है।
आयु-आधारित प्रमाणन पर जोर
रिकी केज ने स्पष्ट किया है कि उनकी प्राथमिकता फिल्मों में अनावश्यक कटौती करने के बजाय ‘आयु-आधारित प्रमाणन’ (Age-based certification) को अधिक प्रभावी बनाना है। उनका तर्क है कि यदि कोई फिल्म वयस्कों के लिए बनी है, तो उसे उसी रूप में रहने देना चाहिए, बशर्ते दर्शकों को पहले से चेतावनी दी गई हो।
बच्चों को अनुचित सामग्री से बचाना हमारी जिम्मेदारी है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम वयस्कों के लिए बनाई गई परिपक्व सिनेमा को ‘सैनिटाइज’ करना शुरू कर दें। हमें संतुलन बनाने की आवश्यकता है ताकि माता-पिता अपने बच्चों के लिए सही चुनाव कर सकें।
वैश्विक दृष्टिकोण का समावेश
केज का कहना है कि वे बोर्ड में अपने वैश्विक अनुभव, संगीत की समझ और कहानी कहने की कला का उपयोग करेंगे। उनका लक्ष्य भारतीय फिल्म उद्योग को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालना है, जहाँ कलात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच एक स्वस्थ तालमेल हो।
मुख्य बिंदु:
- फिल्मों में अनावश्यक सेंसरशिप के बजाय बेहतर वर्गीकरण पर ध्यान।
- माता-पिता को सशक्त बनाना ताकि वे बच्चों के लिए सही कंटेंट चुन सकें।
- वैश्विक सिनेमाई मानकों और भारतीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन।
- कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना।
रिकी केज की यह नई भूमिका फिल्म जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। उम्मीद है कि उनके आने से सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता और तार्किकता आएगी।















