₹2,000 से अधिक UPI भुगतान पर 0.4% MDR: व्यापारी वर्ग में बढ़ी चिंता, सरकार से नीति पर पुनर्विचार की मांग

₹2,000 से अधिक UPI भुगतान पर 0.4% MDR: व्यापारी वर्ग में बढ़ी चिंता, सरकार से नीति पर पुनर्विचार की मांग

डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के बाद अब व्यापारियों पर अतिरिक्त लागत क्यों? व्यापारी संगठनों ने उठाए सवाल

भोपाल। संतोष राज की विशेष रिपोर्ट : 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के पात्र UPI Person-to-Merchant (P2M) लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत Merchant Discount Rate (MDR) लागू होने की घोषणा के बाद व्यापारी वर्ग में चिंता और असंतोष का माहौल है। नए प्रावधान के तहत यह शुल्क व्यापारी-पक्ष से लिया जाएगा और ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर इसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति लेनदेन निर्धारित की गई है। व्यापारियों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से सरकार और बैंकिंग व्यवस्था ने डिजिटल भुगतान, UPI और कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दिया। ग्राहकों और दुकानदारों को बार-बार डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। आज बड़ी संख्या में व्यापारी अपने कारोबार का हिसाब-किताब डिजिटल माध्यम से रखते हैं और ग्राहक भी UPI को अपनी रोजमर्रा की भुगतान व्यवस्था का हिस्सा बना चुके हैं। ऐसे समय में बड़े व्यापारी लेनदेन पर MDR लगाने से व्यापारियों की लागत बढ़ने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। व्यापारी संगठनों का तर्क है कि पहले से ही कारोबारी वर्ग GST, आयकर, स्थानीय निकाय शुल्क, लाइसेंस फीस और अन्य वैधानिक दायित्वों का भुगतान करता है। ऐसे में डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा पर अतिरिक्त लागत डालने से छोटे और मध्यम कारोबारियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सरकार और NPCI का कहना है कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है। यह भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और UPI ऐप प्रदाताओं के बीच वितरित होने वाला शुल्क है। सरकार का तर्क है कि इससे UPI के बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा और तकनीकी व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही ₹2,000 तक के P2M भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान को शुल्क से बाहर रखा गया है। लेकिन व्यापारी वर्ग का सवाल है कि डिजिटल इंडिया और कैशलेस अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जिन व्यापारियों ने वर्षों तक डिजिटल भुगतान को अपनाया, उन्हीं पर अब अतिरिक्त लागत डालना कितना उचित है?, व्यापारी संगठनों की ओर से यह भी चिंता जताई जा रही है कि अतिरिक्त लागत के कारण कुछ कारोबारी डिजिटल भुगतान के बजाय नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लग सकते हैं। हाल में Retailers Association of India सहित कुछ कारोबारी संगठनों ने भी MDR को लेकर आपत्तियां और पुनर्विचार की मांग उठाई है। व्यापारियों का कहना है कि सरकार को ऐसी किसी भी नई व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए जिससे कारोबार की लागत बढ़ती हो। यदि डिजिटल भुगतान देश की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो उसे और सरल, सस्ता तथा व्यापारी-अनुकूल बनाने की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। विशेष रूप से छोटे और मध्यम कारोबारियों का कहना है कि व्यापार में मार्जिन पहले ही कई क्षेत्रों में सीमित है। ऐसे में प्रत्येक बड़े डिजिटल लेनदेन पर लगने वाली अतिरिक्त लागत सालभर में महत्वपूर्ण राशि बन सकती है। सरकार ने छोटे व्यापारियों के लिए कुछ राहत का प्रावधान भी रखा है। सीधे बैंक खाते में QR के माध्यम से UPI से प्रति माह ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे विक्रेताओं को MDR से छूट दी गई है। व्यापारी वर्ग लंबे समय से देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्थानीय बाजार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। राजनीतिक दलों के लिए भी व्यापारियों की समस्याएं और उनकी आर्थिक चिंताएं महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे हैं। ऐसे में व्यापारियों का कहना है कि नई UPI-MDR व्यवस्था लागू करने से पहले सरकार को व्यापारी संगठनों के साथ व्यापक संवाद करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की नीति और व्यापारियों पर पड़ने वाली लागत के बीच संतुलन बना रहे। व्यापारी वर्ग का कहना है कि सरकार से नाराजगी किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का विषय मात्र नहीं, बल्कि नीति से जुड़े सवाल का विषय है। यदि किसी नीति से व्यापारी और आम उपभोक्ता प्रभावित होते हैं तो सरकार को उनकी आपत्तियां सुनकर आवश्यक सुधार पर विचार करना चाहिए। व्यापारियों की मांग है कि UPI-MDR की नई व्यवस्था की समीक्षा की जाए, छोटे एवं मध्यम कारोबारियों पर पड़ने वाले वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जाए और व्यापारी संगठनों के साथ चर्चा के बाद ही आगे की व्यवस्था तय की जाए। अब देखना होगा कि 15 अक्टूबर से प्रस्तावित व्यवस्था पर व्यापारी संगठनों की आपत्तियों के बीच सरकार और NPCI आगे क्या कदम उठाते हैं।

यूपीआई शुल्क पर उमर अब्दुल्ला का बड़ा बयान, कहा- मुफ्त की चीजों की कद्र नहीं होती

यूपीआई शुल्क पर उमर अब्दुल्ला का बड़ा बयान, कहा- मुफ्त की चीजों की कद्र नहीं होती

Sudarshantoday ब्यूरो: जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने डिजिटल भुगतान प्रणाली यूपीआई (UPI) पर शुल्क लगाने के विचार का समर्थन करते हुए एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अक्सर लोग उन सेवाओं की अहमियत नहीं समझते जो उन्हें मुफ्त में मिलती हैं। उनके इस बयान ने डिजिटल इकोनॉमी और उपभोक्ता व्यवहार पर एक नई बहस छेड़ दी है।

मुफ्त सेवाओं पर उमर अब्दुल्ला की राय

उमर अब्दुल्ला ने अपने हालिया संबोधन में डिजिटल लेनदेन की सुगमता पर बात करते हुए कहा कि यूपीआई ने भारत में वित्तीय क्रांति ला दी है, लेकिन किसी भी सेवा को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए उसकी लागत का प्रबंधन जरूरी है। उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई सेवा पूरी तरह से मुफ्त होती है, तो समाज में उसकी वास्तविक उपयोगिता और मूल्य को लेकर गंभीरता कम हो जाती है।

डिजिटल भुगतान का ढांचा खड़ा करना और उसे सुरक्षित रखना एक खर्चीली प्रक्रिया है। मेरा मानना है कि यदि मामूली शुल्क लगाया जाता है, तो यह न केवल सिस्टम को मजबूत करेगा बल्कि उपयोगकर्ताओं में जिम्मेदारी की भावना भी पैदा करेगा।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव सरकार और बैंकों के सामने एक बड़ी चुनौती है। जहां एक ओर यह बैंकों के लिए राजस्व का जरिया बन सकता है, वहीं दूसरी ओर आम जनता के बीच डिजिटल भुगतान की बढ़ती लोकप्रियता पर इसका असर पड़ सकता है।

प्रमुख बिंदु:

  • यूपीआई ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने से बैंकों के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिल सकती है।
  • उमर अब्दुल्ला के अनुसार, शुल्क लगाने से सेवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा में सुधार होगा।
  • आम जनता की प्रतिक्रिया अभी भी इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
  • डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार को संतुलन बनाना होगा।

फिलहाल, सरकार की ओर से यूपीआई पर किसी भी तरह के शुल्क लगाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस पर चर्चा तेज हो गई है।

सोशल मीडिया की लत पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

सोशल मीडिया की लत पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

Sudarshantoday ब्यूरो: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ‘एडिक्टिव डिजाइन’ (लत लगाने वाले डिजाइन) को लेकर एक महत्वपूर्ण सुनवाई में केंद्र सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई है कि कैसे एल्गोरिदम और नोटिफिकेशन के जरिए युवाओं और बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का आदी बनाया जा रहा है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं।

डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य का संकट

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपनाए जा रहे तरीके न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि ये उपयोगकर्ता की मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ खिलवाड़ भी कर रहे हैं। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि ‘अनंत स्क्रॉलिंग’ (infinite scrolling) और ‘पुश नोटिफिकेशन’ जैसे फीचर्स का उद्देश्य उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक स्क्रीन से चिपकाए रखना है, जिससे उनकी उत्पादकता और मानसिक शांति प्रभावित हो रही है।

अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग मानवीय विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसे एक ऐसी लत में तब्दील करने के लिए जो समाज के भविष्य यानी युवाओं की एकाग्रता को ही खत्म कर दे।

प्रमुख बिंदु और भविष्य की राह

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम की पारदर्शिता पर सवाल।
  • युवाओं और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए कड़े नियमों की आवश्यकता।
  • केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि क्या इन प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष नीति बनाई जा रही है।
  • डिजिटल वेलबीइंग को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी बदलावों पर जोर।

फिलहाल, केंद्र सरकार को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों को अपने डिजाइन में बदलाव करने के लिए मजबूर किया जाएगा या सरकार कोई नया नियामक ढांचा तैयार करेगी।

चाइल्ड एब्यूज कंटेंट पर मेटा की बढ़ी मुश्किलें, सरकार ने 'सेफ हार्बर' सुरक्षा पर उठाए सवाल

चाइल्ड एब्यूज कंटेंट पर मेटा की बढ़ी मुश्किलें, सरकार ने ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा पर उठाए सवाल

Sudarshantoday ब्यूरो: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा पर चाइल्ड एब्यूज (बाल यौन शोषण) से जुड़ी सामग्री को लेकर सरकार का रुख बेहद सख्त हो गया है। मेटा द्वारा अपनी खामियों को स्वीकार किए जाने के बाद, अब केंद्र सरकार ने कंपनी के ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) स्टेटस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला तब तूल पकड़ा जब प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक सामग्री को रोकने में मेटा की विफलता सामने आई।

सेफ हार्बर सुरक्षा पर संकट

आईटी नियमों के तहत अब तक मेटा को ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा प्राप्त थी, जिसके तहत प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री के लिए कंपनी को कानूनी रूप से सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था। हालांकि, सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सुरक्षा कवच बिना शर्त नहीं है। यदि प्लेटफॉर्म सुरक्षा मानकों का पालन करने में विफल रहता है, तो यह विशेषाधिकार छीना जा सकता है।

एनसीपीसीआर का स्पष्ट मानना है कि सेफ हार्बर सुरक्षा कोई स्थायी अधिकार नहीं है, बल्कि यह प्लेटफॉर्म द्वारा जिम्मेदारी निभाने की शर्त पर आधारित है। सुरक्षा में चूक होने पर मेटा को कानूनी परिणामों का सामना करना होगा।

मेटा के लिए नई गाइडलाइंस

सरकार ने मेटा को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) के किसी भी मामले को तुरंत संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट करे। कंपनी को अब अपनी एल्गोरिदम और मॉडरेशन नीतियों में बड़े बदलाव करने होंगे ताकि ऐसी सामग्री को फैलने से रोका जा सके।

प्रमुख बिंदु:

  • मेटा ने अपनी मॉडरेशन प्रणाली में खामियों को स्वीकार किया है।
  • सरकार ने सेफ हार्बर इम्यूनिटी को समीक्षा के दायरे में रखा है।
  • CSAM सामग्री की रिपोर्टिंग अनिवार्य कर दी गई है।
  • प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े तकनीकी मानकों की मांग की गई है।

आने वाले दिनों में मेटा को अपनी जवाबदेही साबित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा उसे भारत में अपनी कानूनी सुरक्षा खोने का बड़ा जोखिम उठाना पड़ सकता है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग को स्ट्रोक आने का दावा, सोशल मीडिया पर मची खलबली

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग को स्ट्रोक आने का दावा, सोशल मीडिया पर मची खलबली

Sudarshantoday ब्यूरो: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वास्थ्य को लेकर सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज दावा किया गया है। चीन डेमोक्रेसी पार्टी के अध्यक्ष वांग जुनताओ ने यह दावा किया है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग को स्ट्रोक आया था और वे मंच पर बेहोश हो गए थे। हालांकि, इस दावे के बाद इंटरनेट पर बहस छिड़ गई है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ ने इस पोस्ट पर कम्युनिटी नोट जोड़कर इसे भ्रामक बताया है।

दावे की सच्चाई और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

वांग जुनताओ ने अपने आधिकारिक हैंडल से दावा किया कि शी जिनपिंग की तबीयत अचानक बिगड़ी थी, जिसके कारण उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ी। इस दावे के वायरल होते ही अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल मच गई। हालांकि, चीनी सरकार या आधिकारिक मीडिया की ओर से इस पर कोई पुष्टि नहीं की गई है। इसके उलट, ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग की सार्वजनिक उपस्थिति और उनके कार्यक्रमों को सामान्य बताया गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावों की पुष्टि के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए हैं। प्लेटफॉर्म ने इसे भ्रामक करार देते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसी खबरें बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के प्रसारित की जा रही हैं।

प्रमुख बिंदु

  • चीन डेमोक्रेसी पार्टी के प्रमुख ने शी जिनपिंग के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर दावा किया।
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ ने इस पोस्ट पर कम्युनिटी नोट लगाकर इसे भ्रामक बताया।
  • चीनी प्रशासन ने इन दावों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
  • ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग की गतिविधियों में कोई असामान्य बदलाव नहीं देखा गया था।

भ्रामक सूचनाओं का दौर

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक नेताओं के स्वास्थ्य को लेकर अक्सर इस तरह की अफवाहें फैलाई जाती हैं, जिनका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना होता है। वर्तमान में, शी जिनपिंग के स्वास्थ्य को लेकर चल रही ये चर्चाएं केवल अटकलों पर आधारित प्रतीत होती हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि जब तक कोई आधिकारिक स्रोत या विश्वसनीय फुटेज सामने नहीं आती, तब तक ऐसे दावों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा: हर जिला मुख्यालय पर बनेंगे दो चार्जिंग स्टेशन, हाईकोर्ट का आदेश

छत्तीसगढ़ में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा: हर जिला मुख्यालय पर बनेंगे दो चार्जिंग स्टेशन, हाईकोर्ट का आदेश

Sudarshantoday ब्यूरो: छत्तीसगढ़ में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के बढ़ते चलन और बुनियादी ढांचे की कमी को देखते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि प्रदेश के प्रत्येक जिला मुख्यालय पर कम से कम दो इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाएं।

बुनियादी ढांचे की कमी पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि राज्य में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन उनके लिए आवश्यक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर उस गति से विकसित नहीं हो पा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक चार्जिंग की पर्याप्त सुविधा नहीं होगी, तब तक आम जनता इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में हिचकिचाएगी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना समय की मांग है, लेकिन इसके लिए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है, जिसे तत्काल दूर किया जाना चाहिए।

आदेश के मुख्य बिंदु

  • हर जिला मुख्यालय पर न्यूनतम दो ईवी चार्जिंग स्टेशन का निर्माण।
  • सार्वजनिक स्थानों और प्रमुख मार्गों पर चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार।
  • निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरल नीतियां बनाना।
  • पर्यावरण अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना।

प्रदूषण पर लगाम लगाने की कवायद

विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य में ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। वर्तमान में चार्जिंग स्टेशनों की कमी के कारण लोग इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने से कतराते हैं। अब सरकारी स्तर पर इन केंद्रों के निर्माण से न केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री बढ़ेगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी। राज्य सरकार को अब इस आदेश के अनुपालन के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब (संशोधन) अधिनियम 2026: पंजाब सरकार ने गठित की 7 सदस्यीय समन्वय समिति

श्री गुरु ग्रंथ साहिब (संशोधन) अधिनियम 2026: पंजाब सरकार ने गठित की 7 सदस्यीय समन्वय समिति

Sudarshantoday ब्यूरो: पंजाब सरकार ने बुधवार को श्री अकाल तख्त साहिब के निर्देशों का पालन करते हुए श्री गुरु ग्रंथ साहिब (संशोधन) अधिनियम, 2026 से संबंधित मामलों पर विचार-विमर्श के लिए एक सात सदस्यीय समन्वय समिति का गठन किया है। यह कदम राज्य में धार्मिक भावनाओं और सिख समुदाय की मांगों को देखते हुए उठाया गया है।

समिति का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र

इस उच्च स्तरीय समिति का मुख्य उद्देश्य प्रस्तावित संशोधन अधिनियम के विभिन्न पहलुओं पर बारीकी से अध्ययन करना और संबंधित पक्षों के साथ संवाद स्थापित करना है। सरकार का कहना है कि श्री अकाल तख्त साहिब के मार्गदर्शन में यह समिति एक पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करेगी ताकि सिख पंथ की मर्यादा और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बना रहे।

सिख समुदाय की आस्था और धार्मिक परंपराओं को सर्वोपरि रखते हुए, सरकार ने अकाल तख्त साहिब के निर्देशों के अनुरूप इस समिति का गठन किया है, जो अधिनियम से जुड़े सभी संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करेगी।

प्रमुख बिंदु

  • समिति में सात सदस्य शामिल किए गए हैं जो कानूनी और धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।
  • यह समिति श्री अकाल तख्त साहिब के निर्देशों के तहत कार्य करेगी।
  • अधिनियम के क्रियान्वयन से पहले सभी संबंधित पक्षों से राय ली जाएगी।
  • इसका मुख्य लक्ष्य धार्मिक सद्भाव और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना है।

राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समिति के गठन से अधिनियम को लेकर चल रहे विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी और सरकार व धार्मिक नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा।

बाल यौन शोषण सामग्री पर मेटा को सरकार की दो टूक, कहा- नहीं मिलेगी कोई छूट

बाल यौन शोषण सामग्री पर मेटा को सरकार की दो टूक, कहा- नहीं मिलेगी कोई छूट

Sudarshantoday ब्यूरो: केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया दिग्गज मेटा (Meta) को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि बाल यौन शोषण (Child Sexual Abuse Material) से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने में किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, मेटा ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है, लेकिन सरकार का रुख साफ है कि कंपनी को इस गंभीर मामले में कोई कानूनी सुरक्षा या छूट नहीं दी जा सकती।

कानूनी जवाबदेही से पीछे नहीं हट सकती कंपनी

हालिया घटनाक्रम में यह बात सामने आई है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को रोकने में तकनीकी खामियां पाई गई थीं। सरकार ने इसे आईटी नियमों का सीधा उल्लंघन माना है। सूत्रों का कहना है कि मेटा ने अपनी गलती को स्वीकार किया है, लेकिन केवल माफी काफी नहीं है। सरकार का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अपने उपयोगकर्ताओं, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा के लिए अधिक जिम्मेदार होना होगा।

डिजिटल सुरक्षा के मामले में कोई भी कंपनी कानून से ऊपर नहीं है। मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्लेटफॉर्म पर ऐसी घिनौनी सामग्री के लिए कोई जगह न हो। सरकार इस मामले में सख्त निगरानी बनाए रखेगी।

क्या हैं सरकार के कड़े निर्देश?

  • मेटा को बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान करने और उसे तुरंत हटाने के लिए एल्गोरिदम में सुधार करना होगा।
  • कंपनी को भारत के आईटी कानूनों के तहत अपनी जवाबदेही तय करनी होगी।
  • किसी भी प्रकार की तकनीकी चूक को ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

भविष्य की रणनीति

सरकार अब इस बात पर जोर दे रही है कि मेटा जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स को ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की छूट नहीं दी जा सकती। आने वाले दिनों में सरकार सोशल मीडिया कंपनियों के लिए सुरक्षा मानकों को और अधिक कड़ा करने की योजना बना रही है ताकि बच्चों के लिए इंटरनेट को सुरक्षित बनाया जा सके।

राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल बेंगलुरु ने जीता 'आर्मी चीफ ट्रॉफी', NDA में शानदार प्रदर्शन का सम्मान

राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल बेंगलुरु ने जीता ‘आर्मी चीफ ट्रॉफी’, NDA में शानदार प्रदर्शन का सम्मान

Sudarshantoday ब्यूरो: राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल (RMS), बेंगलुरु ने एक बार फिर अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता और सैन्य प्रशिक्षण की परंपरा को कायम रखते हुए प्रतिष्ठित ‘आर्मी चीफ ट्रॉफी’ अपने नाम की है। यह सम्मान स्कूल को नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में सबसे बेहतरीन परिणाम देने के लिए प्रदान किया गया है।

सैन्य शिक्षा में श्रेष्ठता का प्रतीक

यह उपलब्धि स्कूल के कैडेट्स के अनुशासन, कड़ी मेहनत और शिक्षकों के मार्गदर्शन का परिणाम है। भारतीय सेना के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दी जाने वाली यह ट्रॉफी उन संस्थानों को दी जाती है जो देश की रक्षा सेवाओं में भविष्य के अधिकारियों को तैयार करने में सबसे अधिक सफल रहते हैं।

यह ट्रॉफी न केवल हमारे स्कूल के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि यह उन सभी कैडेट्स की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है जिन्होंने देश सेवा का संकल्प लिया है।

सफलता के मुख्य बिंदु

  • NDA प्रवेश परीक्षा में रिकॉर्ड चयन दर।
  • अनुशासित जीवनशैली और शारीरिक प्रशिक्षण पर विशेष जोर।
  • अत्याधुनिक शैक्षणिक वातावरण और अनुभवी फैकल्टी का योगदान।
  • देश के भविष्य के सैन्य नेतृत्व को तैयार करने की निरंतरता।

बेंगलुरु स्थित यह संस्थान दशकों से भारतीय सशस्त्र बलों को कुशल और समर्पित अधिकारी प्रदान करने का केंद्र रहा है। इस ट्रॉफी के मिलने से स्कूल के छात्रों और स्टाफ में उत्साह का माहौल है, जो आने वाले वर्षों में और भी बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित हैं।

राहुल गांधी का पीएम मोदी पर तीखा हमला, कहा- ट्रंप के सामने झुकने के बजाय रीढ़ दिखाएं

राहुल गांधी का पीएम मोदी पर तीखा हमला, कहा- ट्रंप के सामने झुकने के बजाय रीढ़ दिखाएं

Sudarshantoday ब्यूरो: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा है। राहुल गांधी ने ‘यूपीआई टैक्स’ के मुद्दे को लेकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और पीएम मोदी से आग्रह किया कि वे अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुकने के बजाय देश के हितों को प्राथमिकता दें।

यूपीआई टैक्स और अंतरराष्ट्रीय दबाव

राहुल गांधी ने अपने हालिया बयान में आरोप लगाया कि सरकार विदेशी दबाव में आकर यूपीआई जैसे सफल डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर पर टैक्स लगाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने इसे आम आदमी की जेब पर सीधा डाका करार दिया है। राहुल ने कहा कि भारत की डिजिटल क्रांति को विदेशी कंपनियों के हितों के लिए बलि नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।

राहुल गांधी ने कहा, ‘प्रधानमंत्री को रीढ़ दिखानी चाहिए और डोनाल्ड ट्रंप के सामने लेटने के बजाय देश के लोगों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। यूपीआई पर टैक्स लगाना जनता के साथ अन्याय है।’

मुख्य बिंदु

  • राहुल गांधी ने यूपीआई पर संभावित टैक्स को आम जनता पर बोझ बताया।
  • विदेशी दबाव में आर्थिक नीतियों में बदलाव को लेकर सरकार को घेरा।
  • पीएम मोदी से आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हितों पर अडिग रहने की मांग की।

विपक्ष का आक्रामक रुख

कांग्रेस का मानना है कि यूपीआई की सफलता भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापारिक समझौतों को लेकर सरकार की नीतियों पर विपक्ष लगातार हमलावर है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार अपनी नीतियों के जरिए विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने का काम कर रही है।