धार्मिक मान्यता के अनुसार दक्षिण दिशा पितरों से जुड़ी मानी जाती है; पितृ पक्ष में शाम को दीपक जलाकर पूर्वजों का स्मरण और सम्मान करने की परंपरा है
भोपाल। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और स्मरण का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करता है और उनकी आत्मिक शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान तथा दान जैसे धार्मिक कर्म करता है। पितृ पक्ष में शाम के समय दीपक जलाने की भी परंपरा है।
धार्मिक और वास्तु मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है। इसलिए कई परंपराओं में पितरों के निमित्त दीपक दक्षिण दिशा में रखने की बात कही गई है। हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं और अलग-अलग क्षेत्रों व परिवारों में इनके पालन का तरीका अलग हो सकता है। �
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2026 में कब से कब तक है पितृ पक्ष?
इस वर्ष पितृ पक्ष 27 सितंबर 2026 से 10 अक्टूबर 2026 तक माना जा रहा है। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी, जिसे पितृ पक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। अलग-अलग पंचांग परंपराओं में स्थानीय तिथि और मुहूर्त में अंतर हो सकता है। �
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शाम को पितरों के लिए दीपक क्यों जलाया जाता है?
धार्मिक मान्यता में दीपक को प्रकाश, श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान शाम को दीपक जलाना पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने की एक परंपरा है।
कुछ धार्मिक परंपराओं में घर में पितरों की तस्वीर या उनके लिए निर्धारित स्थान के सामने दीपक जलाने की बात कही गई है। वहीं पीपल के पेड़ के नीचे भी शाम को दीपक जलाने की परंपरा कुछ परिवारों में प्रचलित है। �
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पितरों का दीपक किस दिशा में जलाएं?
दक्षिण दिशा को माना जाता है पितरों की दिशा
वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दक्षिण दिशा पितरों से संबंधित दिशा मानी जाती है। इसलिए पितरों के निमित्त दीपक दक्षिण दिशा में रखने की परंपरा मिलती है। इसी तरह पितृ तर्पण के दौरान भी दक्षिण दिशा की ओर मुख करने का विधान कई परंपराओं में बताया गया है। �
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दक्षिण-पश्चिम दिशा का भी उल्लेख
कुछ वास्तु परंपराओं में दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा को भी पितरों से संबंधित माना जाता है। पितरों की तस्वीर रखने के लिए दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा का उल्लेख मिलता है। �
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पितरों के दीपक के लिए कौन-सा स्थान रखें?
यदि घर में पूर्वजों की तस्वीर के लिए अलग और सम्मानजनक स्थान निर्धारित है, तो वहां दीपक जलाया जा सकता है। स्थान साफ-सुथरा और शांत रखना धार्मिक परंपराओं के अनुरूप माना जाता है।
कुछ मान्यताओं में पितरों की तस्वीर को देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ पूजा स्थान में रखने के बजाय अलग सम्मानजनक स्थान देने की सलाह दी जाती है। �
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पीपल के पेड़ के नीचे भी जलाया जाता है दीपक
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाते हैं। यह भी धार्मिक परंपरा और लोकमान्यता का हिस्सा है। कुछ मान्यताओं में इसे पितरों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है। �
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दीपक जलाते समय किन बातों का ध्यान रखें?
दीपक जलाने का स्थान साफ रखें।
पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें, जहां आग लगने का खतरा न हो।
परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-विधि करें।
तर्पण और श्राद्ध की विधि के लिए अपने परिवार की परंपरा या पुरोहित के निर्देशों का पालन करें।
पितृ पक्ष में सिर्फ दीपक ही नहीं, तर्पण का भी महत्व
पितृ पक्ष में तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान को महत्वपूर्ण धार्मिक कर्म माना जाता है। तर्पण में जल, काले तिल और कुश का उपयोग करने की परंपरा है तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने का उल्लेख मिलता है। �
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श्राद्ध कर्म के लिए दिन के विशेष समय को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध 2026 पंचांग संबंधी जानकारी में कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल का उल्लेख किया गया है; सटीक समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। �
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क्या दीपक जलाने से पितृ दोष समाप्त होता है?
पितृ पक्ष में दीपक जलाने को लेकर कई धार्मिक और लोक मान्यताएं हैं। कुछ परंपराओं में इसे पितृ दोष से जुड़े उपाय के रूप में भी बताया जाता है। लेकिन इसे धार्मिक मान्यता के रूप में ही समझना चाहिए; इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाणित चिकित्सकीय या वैज्ञानिक प्रभाव स्थापित नहीं है। परिवार अपनी परंपरा और धार्मिक विश्वास के अनुसार इसका पालन कर सकते हैं।
धार्मिक मान्यता का सार
पितृ पक्ष में शाम को पितरों के निमित्त दीपक जलाना श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक माना जाता है। दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है, इसलिए इस दिशा में दीपक रखने की परंपरा कई धार्मिक-वास्तु मान्यताओं में मिलती है। �
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डिस्क्लेमर: यह खबर धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और वास्तु संबंधी प्रचलित धारणाओं पर आधारित है। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि एवं मान्यताएं अलग हो सकती हैं।















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