Sudarshantoday ब्यूरो: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्य के विभाजन का मुद्दा गरमा गया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा है। राजभर के इस बयान ने दशकों पुराने उस बहस को नई हवा दे दी है, जिसमें प्रशासनिक सुगमता के लिए बड़े राज्यों के पुनर्गठन की मांग की जाती रही है।
छोटे राज्यों का तर्क और राजभर की दलील
ओम प्रकाश राजभर का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का विकास एक समान रूप से करना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने तर्क दिया कि जब राज्य छोटे होते हैं, तो वहां की सरकारें जनता तक बेहतर ढंग से पहुंच पाती हैं और विकास कार्यों में तेजी आती है। राजभर के अनुसार, उन्होंने इस विषय पर प्रधानमंत्री के साथ विस्तृत चर्चा की है और उन्हें इस दिशा में सकारात्मक संकेत मिले हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने मेरी बातों को गंभीरता से सुना है। छोटे राज्यों के गठन से न केवल शासन-प्रशासन चुस्त होगा, बल्कि पिछड़े क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाने का अवसर भी मिलेगा।
क्या है यूपी विभाजन का इतिहास?
उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग कोई नई नहीं है। पूर्ववर्ती बसपा सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश को चार अलग-अलग राज्यों (पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश) में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित कराया था। हालांकि, केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
प्रमुख बिंदु:
- प्रशासनिक दक्षता के लिए छोटे राज्यों की वकालत।
- पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में विकास की धीमी गति का मुद्दा।
- राजनीतिक गलियारों में इस दावे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं।
- केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजभर का यह बयान आगामी चुनावों के मद्देनजर एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। हालांकि, भाजपा नेतृत्व ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक रुख स्पष्ट नहीं किया है। राज्य के विभाजन का मुद्दा हमेशा से ही एक संवेदनशील विषय रहा है, जिस पर भविष्य में बड़ी बहस छिड़ सकती है।

















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