Sudarshantoday ब्यूरो: हिंदी सिनेमा में कामुकता, इच्छा और बेवफाई जैसे विषयों पर बनी फिल्मों को अक्सर दर्शकों और आलोचकों के एक वर्ग से तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है। हाल ही में ‘लस्ट स्टोरीज 3’ से जुड़े निर्देशकों विक्रमাদित्य मोटवाने और शकुन बत्रा ने इस बहस को नई दिशा दी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि बोल्ड फिल्मों के प्रति समाज में जो नकारात्मकता दिखती है, उसके पीछे ‘गेटकीपर्स’ की सोच जिम्मेदार है, न कि आम दर्शकों की पसंद।
युवा पीढ़ी और बदलती सोच
विक्रमাদित्य मोटवाने का मानना है कि आज की युवा पीढ़ी उन विषयों के प्रति कहीं अधिक उदार और समझदार है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के सिनेमा में वर्जित माना जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि दर्शक ऐसी कहानियों को देखने के लिए तैयार हैं, लेकिन इंडस्ट्री के कुछ लोग अपनी पुरानी मान्यताओं को उन पर थोपने की कोशिश करते हैं।
कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की गहराई को छूना है। जब हम इच्छा या बेवफाई जैसे विषयों को पर्दे पर लाते हैं, तो हमारा लक्ष्य उसे अश्लीलता नहीं, बल्कि एक काव्यात्मक और अर्थपूर्ण अनुभव बनाना होता है।
नैतिकता का चश्मा और सिनेमा
शकुन बत्रा ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय समाज में नैतिकता के जो कठोर मानक तय किए गए हैं, वे अक्सर सिनेमाई रचनात्मकता के आड़े आते हैं। उन्होंने कहा कि ‘गेटकीपर्स’ यानी वे लोग जो तय करते हैं कि दर्शकों को क्या देखना चाहिए, वे अक्सर अपनी व्यक्तिगत नैतिकता को सामाजिक नैतिकता मान लेते हैं।
मुख्य बिंदु:
- दर्शकों की पसंद और इंडस्ट्री की धारणा के बीच बड़ा अंतर है।
- बोल्ड विषयों को कलात्मक तरीके से पेश करना एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है।
- युवा दर्शक जटिल और परिपक्व कहानियों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
- सिनेमा को नैतिकता के घेरे से बाहर निकलकर मानवीय भावनाओं को ईमानदारी से दिखाना चाहिए।
निर्देशकों का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर बोल्ड कंटेंट को लेकर सेंसरशिप की मांग तेज हो रही है। मोटवाने और बत्रा का मानना है कि यदि कहानी में गहराई है, तो बोल्डनेस केवल एक माध्यम बन जाती है, न कि फिल्म का मुख्य उद्देश्य।

















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